एक एक्टर ने दूसरे को चाकू मारा और फिल्म की कहानी बदल गई ऐसा क्यों हुआ

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12 अगस्त, 1997. इस दिन रामगोपाल वर्मा अपनी फिल्म ‘रंगीला’ (1995) के प्रोड्यूसर झामु सुगंध के ऑफिस में बैठे अपनी आने वाली फिल्म के बारे में कुछ डिस्कस रहे थे. वर्मा एक प्रॉपर मुंबई बेस्ड एक्शन फिल्म बनाना चाहते थे. इसी समय झामु को एक फोन आया और पता चला कि सुबह तकरीबन साढ़े आठ के करीब म्यूज़िक प्रोड्यूसर गुलशन कुमार की गोली मारकर हत्या कर दी गई है. झामु बताने लगे कि गुलशन कुमार ने सुबह सात बजे जागने के बाद उन्हें फोन किया था. कहा था कि एक सिंगर और फिर एक दोस्त से मिलने के बाद वो मंदिर जाएंगे और उसके बाद झामु से मिलने आएंगे. लेकिन इस कॉल के डेढ़ घंटे बाद अंधेरी के जीतेश्वर महादेव मंदिर के सामने गुलशन कुमार को एक के बाद एक 17 गोलियां मार दी गईं. उनकी जान तुरंत चली गई.

रामगोपाल वर्मा फिल्ममेकर थे, वो इस पूरी घटना को सिनेमा के लिहाज़ से विज़ुअलाइज़ करने लगे, जैसे ये किसी फिल्म का सीन हो. वो सोचने लगे कि अगर गुलशन कुमार सुबह सात बजे उठे, तो उनको गोली मारने वाला कितने बजे उठा होगा? उसने अपने घर पर क्या बोला होगा? उनका दिमाग इस बात पर ठहर गया कि गैंगस्टर लोग या तो मारते हैं, या मरते हैं. लेकिन इसके बीच में उनका जीवन कैसा होता होगा. वो क्या करते होंगे? क्या सोचते होंगे? इस घटना से उन्हें फिल्म ‘सत्या’ का आइडिया आया.

म्यूज़िक लेबल टी-सीरीज़ को गुलशन कुमार ने ही खड़ किया था. अब टी-सीरीज़ उनके बेटे भूषण कुमार संभालते हैं.

वही ‘सत्या’, जिसे आज गैंगस्टरों पर बेस्ड महान फिल्मों में गिना जाता है. इसके पीछे का कारण था गैंगस्टरों का रियल लाइफ पोर्ट्रेयल. रियल लाइफ पोर्ट्रेयल मतलब किसी को ऐसे दिखाना जैसे वो असल ज़िंदगी में होते हैं. अब तक जो भी गैंगस्टर फिल्मों में दिखाए जाते थे, वो सब ऊंची कद-काठी, भारी-भरकम बदन के हुआ करते थे. उन्हें देखने भर से जनता में खलबली मच जाती थी. लेकिन इस फिल्म को बनाने के दौरान रामू को गैंगस्टर्स का कुछ अलग ही रूप देखने को मिला. उन्होंने देखा कि असल में ये भी आम इंसान जैसे ही होते हैं. हमारे-आपके बीच ही रहते हैं. नॉर्मली बिहेव करते हैं.

उन्होंने ये सब जाना अपने एक्सपीरियंस से. रामू के एक दोस्त मुंबई के ओशिवरा इलाके में रहते थे. उनसे रामू को एक किस्सा सुनने को मिला. उन्होंने बताया कि वो अपनी बिल्डिंग में 14वें माले पर रहते थे. उनसे भी ऊपर एक आदमी रहता था. आते-जाते कई बार उनकी मुलाकात भी हुई थी. दोनों एक दूसरे को गुड मॉर्निंग वगैरह बोलते रहते थे. एक दिन उनकी पत्नी ने बताया कि उस आदमी को पुलिस पकड़कर ले गई. उस पर मर्डर का चार्ज था. मुंबई में पड़ोसियों को भी एक दूसरे के बारे में कुछ पता नहीं रहता है. इस घटना से उन्हें फिल्म में एक लव स्टोरी का आइडिया मिला. जैसा कि फिल्म में दिखाया भी गया है कि उर्मिला (विद्या) के पड़ोस में ही एक आदमी रहने को आता है. उसके बारे में बिना कुछ जाने विद्या का किरदार उसके प्रेम में पड़ जाता है.

चक्रवर्ती ने इस फिल्म की तैयारी सिर्फ राम गोपाल वर्मा को देखकर की थी.

फिल्म का सब्जेक्ट बहुत डार्क था. इसमें गानों के लिए भी कोई स्पेस नहीं था. रामू ने सोच लिया था कि इस फिल्म को बिना गाने के बनाएंगे. लेकिन उस दौर में बिना गाने वाली फिल्म को प्रमोट करना और जनता के बीच पॉपुलर बनाना बहुत मुश्किल था. वो उधेड़बुन में थे. लेकिन इतना क्लीयर था कि गानों से फिल्म को फायदा तो होगा. गाने फिल्म की रिलीज़ से पहले उसे पब्लिक तक पहुंचा देते हैं. किसी काम से वो साउथ के सुपरस्टार नागार्जुन के घर गए हुए थ. यहां उन्हें संदीप चौटा की बनाई धुन सुनने को मिली. उन्हें बहुत पसंद आई. इतनी ज़्यादा पसंद कि उन्होंने संदीप से अपनी फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर करवाने का फैसला कर लिया. फिल्म के अलग-अलग सीक्वेंस के लिए अलग-अलग बैकग्राउंड स्कोर तैयार करवाया गया. इसे नाम दिया गया ‘स्पीरिट ऑफ सत्या’. बाद में इन धुनों की जबरदस्त तारीफ हुई. अब मामला गानों पर आकर फंसा था. इसके लिए रामगोपाल वर्मा ने चुना विशाल भराद्वाज को. विशाल दरअसल मुंबई संगीतकार बनने ही आए थे. फिल्ममेकर उन्हें मजबूरन बनना पड़ा. विशाल की वो पूरी जर्नी आप

जब ये सब चल रहा था, तब तक रामू के पास कोई बाउंड स्क्रिप्ट तक नहीं थी. उन्होंने इस फिल्म को लिखने के लिए अनुराग कश्यप को पकड़ा. ‘ऑटो नारायण’ में अनुराग का काम उन्हें पसंद आया था लेकिन वो इस फिल्म के लिए कोई अनुभवी आदमी चाहते थे. अनुराग ने सौरभ शुक्ला का नाम उन्हें सुझाया. सौरभ को फोन करके बुलाया गया. सौरभ अपनी फिल्म के लिए लिख रहे थे, वो रामू को मना करने का मन बनाकर उनके ऑफिस पहुंचे थे. लेकिन वहां रामू ने उनके लिए एक किरदार गढ़ने की बात बताई. सौरभ ने पहले फिल्म के बारे में सुना और फिर अपने किरदार के बारे में. उन्हें दोनों ही चीज़ें पसंद आ गईं और वो काम करने के लिए राज़ी हो गए.

'सत्या' में सौरभ शुक्ला का किरदार भी रियल लाइफ से ही लिया गया था. एक ऐसे गैंगस्टर को देखकर जिसकी यूं तो कोई औकात नहीं होती लेकिन भौकाल में उसकी भी कोई कमी नहीं होती.

अब बारी थी फिल्म के एक्टरों की. रामू इस फिल्म में कोई बड़ा या जाना-माना नाम नहीं चाहते थे. इसलिए उन्होंने कुछ नए लोग लिए. मनोज बाजपेयी नाम का एक स्ट्रगलर उनकी संजय दत्त स्टारर फिल्म ‘दौड़’ के लिए ऑडिशन देने आया था. रामू ने मनोज से फिल्मी एक्सपीरियंस के बारे में पूछा. मनोज ने बताया कि वो शेखर कपूर निर्देशित ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) में काम कर चुके हैं. उन्होंने काम देखा. ठीक लगा. उन्होंने मनोज से कहा कि उन्हें कोई बड़ा रोल देंगे. ‘दौड़’ फिल्म में काम न करें. लेकिन मनोज फिल्मों में दिखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने ‘दौड़’ में भी काम कर लिया.

इस बार उन्हें फिल्म ‘सत्या’ में टाइटल रोल यानी सत्या का रोल दे दिया गया. लेकिन रामू की खुराफात जारी थी. उन्होंने जे.डी. चक्रवर्ती को भीखू म्हात्रे के रोल के लिए चुना. चक्रवर्ती के साथ रामू तेलुगू फिल्म ‘शिवा’ (1990) में काम कर चुके थे. उन्हें लगा भीखू म्हात्रे के किरदार की हिंदी दुरूस्त होनी चाहिए. इसलिए चक्रवर्ती को फिल्म का लीड रोल देकर भीखू म्हात्रे का किरदार मनोज को दे दिया गया. मनोज इस बात से बहुत निराश हुए. लेकिन काम की कमी के कारण उन्हें ये फिल्म करनी पड़ी. फिल्म की हीरोइन के लिए महिमा चौधरी को अप्रोच किया गया लेकिन फिल्म के विवादित सब्जेक्ट को देखते हुए उन्होंने फिल्म करने से इंकार कर दिया. इसके बाद इसके लिए उर्मिला मातोंडकर को साइन कर लिया गया.

इस फिल्म से पहले भी रामगोपाल वर्मा उर्मिला के साथ फिल्म 'रंगीला' और 'दौड़' में काम कर चुके थे.

‘सत्या’ के एक सीन में उर्मिला मातोंडकर. इस फिल्म से पहले भी रामगोपाल वर्मा उर्मिला के साथ फिल्म ‘रंगीला’ और ‘दौड़’ में काम कर चुके थे.

फिल्म बननी शुरू हुई. पहला सीन शूट हो रहा था. सीन कुछ ऐसा था कि पक्या यानी सुशांत सिंह का किरदार सत्या से हफ्ता मांगने जाता है और सत्या उसके चेहरे पर चाकू चला देता. इसके बाद डायरेक्टर का कट आता और सीन पूरा हो जाता. लेकिन जैसे ही चक्रवर्ती ने सुशांत को चाकू मारा, वो दर्द में चिल्ला दिए. पास में ही खड़े मनोज पाहवा बोल उठे ‘अरे पानी लाओ, पानी लाओ’. सामने ये सब होता देख रामू ने कट ही नहीं बोला. वो पूरा सीन बिलकुल इंप्रोवाइज़्ड तरीके से शूट हुआ. रामू इस सीन के बारे में बताते हैं कि सुशांत की उस एक चीख ने पूरी फिल्म बदल दी. इस सीन के बाद किसी भी एक्टर को लिखकर दी गई लाइन बोलने को नहीं कहा गया. एक्टर सीन में जैसा फील करते, वैसे ही डायलॉग्स बोलते. हालांकि इस तरह की चीज़ें फिल्म के हर सीन में कर पाना संभव नहीं है. इसकी भारपाई की अनुराग कश्यप के लिखे रियलिस्टिक डायलॉग्स ने. अपने संवादों की वजह से ही ये फिल्म सच्चाई के इतने करीब पहुंच पाई कि आज तक तारीफ होती है.

फिल्म सत्या का पहला शूट हुआ सीन. इसके बाद पूरी फिल्म की रुपरेखा बदल गई थी. आज कल सुशांत टीवी पर क्राइम शोज़ होस्ट करते दिखाई देते हैं.

फिल्म ‘सत्या ‘का पहला शूट हुआ सीन. इसके बाद पूरी फिल्म की रुपरेखा बदल गई थी. आज कल सुशांत टीवी पर क्राइम शोज़ होस्ट करते दिखाई देते हैं.

फिल्म के बनकर तैयार होने के बाद मुंबई के डिंपल थिएटर में 60 लोगों को इसके रशेज दिखाए गए. देखने वालों से फिल्म को बहुत निगेटिव रिस्पॉन्स मिला. लोगों का कहना था कि फिल्म अनैतिकता का प्रचार कर रही है. इसके बाद फिल्म के एंड को दोबारा शूट किया गया. फाइनली जब फिल्म रिलीज़ हुई, लोगों से इसे जबरदस्त रिस्पॉन्स मिला. दो करोड़ रुपए के बजट में बनी इस फिल्म ने 15 करोड़ रुपए का बिजनस किया. अवॉर्ड्स की झड़ी लग गई. ‘सत्या’ को बेस्ट फिल्म, बेस्ट एक्टर और बेस्ट एक्ट्रेस (तीनों ही क्रिटिक्स श्रेणी में) समेत 6 फिल्मफेयर और मनोज बाजपेयी को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. 3 जुलाई, 1998 को रिलीज़ हुई इस फिल्म ने आज अपनी अस्तित्व के दो दशक पूरे कर लिए हैं.

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