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Movie Review: शाहिद के करियर में मील का पत्थर बनी ‘कबीर सिंह’, इतने स्टार्स पाकर जीता बॉक्स ऑफिस

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मूवी रिव्यू: कबीर सिंह
कलाकार: शाहिद कपूर, कियारा आडवाणी, सोहम मजूमदार, अर्जन बाजवा आदि
निर्देशक: संदीप वांगा रेड्डी
निर्माता: भूषण कुमार, कृष्ण कुमार, मुराद खेतानी, अश्विन वर्दे
रेटिंग: ***1/2

ओटीटी पर रिलीज हो चुकी अर्जुन रेड्डी को अंग्रेजी सबटाइटल्स के साथ देखने के बाद कबीर सिंह को देखना किसी कौतुहल से कम नहीं रहा। उत्सुकता इस बात की रही कि क्या शाहिद कपूर एक ब्लॉकबस्टर फिल्म के हीरो विजय देवराकोंडा जैसे ही गुस्सैल और आत्महंता हीरो दिख सकते हैं? क्या मुंबई में पली बढ़ी कियारा आडवाणी में वैसे ही सौम्यता, शालीनता और सादगी दिख सकती है जैसी जबलपुर की शालिनी पांडे ने अर्जुन रेड्डी में दिखाई? और, क्या निर्देशक संदीप वांगा रेड्डी अपनी ही फिल्म के हिंदी रीमेक में अपनी ही कहानी को उतनी ही ईमानदारी से पेश करने में कामयाब रहेंगे जितने वह अपनी फिल्म अर्जुन रेड्डी में रहे? इन तीन सवालों में से दो पर आप हरा निशान लगा सकते हैं। और, यही दो वजहें कबीर सिंह को एक कामयाब फिल्म बनाती हैं।

शाहिद कपूर ने अपने हर इंटरव्यू में कबीर सिंह को बताया है। कबीर सिंह फिल्म में दिखता भी वैसा ही है। एक गुस्सैल सर्जन अपनी एक जूनियर से पहली नजर में ही प्यार कर बैठता है। ये जूनियर बकरी जैसी है। न बोलती है, न सींग मारती है। बस हर बात पर सिर हिलाती है। सीनियर सरेआम उसे किस कर लेता है, तब भी वह विरोध नहीं करती। और, एक दिन इसके घरवाले इसे किसी दूसरे खूंटे से बांध देते हैं। अपनी प्रेमिका की शादी कहीं और हो जाने के बाद कबीर सिंह बौरा जाता है। नशे में खुद को डुबो देता है। पर साल में 300 बेहतरीन सर्जरी का रिकॉर्ड भी उसके पास है।

उसका अपना ही क्लीनिक उसके खिलाफ होता है तो उसके भीतर का जमीर जागता है। वह सबकुछ छोड़ घर लौटता है। घर ही हर बागी का असली आसरा होता है, फिल्म ये बात बहुत सरल तरीके से कह जाती है। कबीर सिंह बदलता है तो वह जिंदगी को नए चश्मे से देखता है। उसे समझ आता है कि दुनिया वही है, बस उसका चश्मा ही पुराना हो गया था। निर्देशक संदीप वांगा रेड्डी ने एक हताश और निराश प्रेमी के सीने में ज्वालामुखी भरा है। वह जब तब यहां वहां किसी न किसी बात पर फटता रहता है। जिनके सीने में कहने को बहुत कुछ होता है और वह कह नहीं पाते तो उनका गुस्सा खुद को ही मारता है।

संदीप के निर्देशन में किस्सागोई का गजब का टैलेंट है। बस उनके महिला किरदार जमाने के साथ नहीं चल रहे। मेडिकल कॉलेज की एक लड़की को फिल्म का हीरो जब जहां चाहे वहां से उठा लेता है। जब जहां चाहे वहां चूम लेता है और लड़की बकरी बनी रहती है। संदीप की फिल्म पूरी तरह से उनके हीरो की फिल्म है, बतौर निर्देशक वह बस कबीर के दोस्त को मौका देते हैं, पर्दे पर चमकने का। बाकी सारे किरदार कब आए, कब गए, कहानी सोचती भी नहीं है।

कलाकारों में शाहिद कपूर ने इस किरदार में अपना सब कुछ झोंक दिया है। कमीने, हैदर और उड़ता पंजाब के बाद शाहिद ने एक बार फिर खुद को साबित किया है। रणबीर कपूर, रणवीर सिंह और आयुष्मान खुराना के दौर में वह नए संजीव कुमार बनकर उभरे हैं। एक ऐसा अभिनेता जिसके पास स्टारडम भले न हो पर वह अदाकारी के मामले में सबकी छुट्टी कर सकता है। कियारा आडवाणी का चयन फिल्म की कमजोरी है। कलंक के आइटम नंबर और लस्ट स्टोरीज के दृश्यों से वह अपनी सादगी खो चुकी हैं। फिल्म में असरदार काम किया है कबीर सिंह के दोस्त बने सोहम मजूमदार ने। संदीप रेड्डी ने हिंदी सिनेमा को उनमें एक दमदार अभिनेता की गुंजाइश दिखाई है। बाकी अर्जन बाजवा, सुरेश ओबेरॉय, आदिल हुसैन आदि साथी कलाकारों के लिए फिल्म में करने को कुछ खास नहीं है।

अर्जुन रेड्डी के प्रियतमा वाले गाने का दर्द खोजने वालों को भरे कबीर सिंह का म्यूजिक उतना अच्छा न लगे लेकिन फिल्म का गाना बेखयाली सीजन का हिट गाना है। फिल्म देखकर निकलने के बाद भी यह चुपचाप आपके भीतर रिसता रहता है। रविचंद्रन की सिनेमैटोग्राफी फिल्म का अहम किरदार है, उनका कैमरा दर्शकों को कहानी का हिस्सा बनाकर चलता है। आरिफ शेख की एडीटिंग भी फिल्म के प्रवाह को पैना बनाए रखती है। फिल्म देखने की योजना बनाते समय ध्यान रखें कि यह फिल्म केवल वयस्कों के लिए है। अमर उजाला के वीकली मूवी रिव्यू में फिल्म को मिलते हैं साढ़े तीन स्टार।

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