राजनीति कर्नाटक में राहुल गांधी की कौन सी गलतियां कांग्रेस पर पड़ी भारी ?

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कर्नाटक में कांग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। पार्टी को यहां महज 78 सीटों पर ही जीत मिली। इसके साथ ही दक्षिण में कांग्रेस का मजबूत किला भी ढह गया। हो सकता है कि कांग्रेस जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बना ले, लेकिन एक छत्र राज जरूर खत्म हो गया। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर राहुल गांधी ने वो कौन सी गलतियां कीं, जिसके कारण कांग्रेस की कर्नाटक में ये बुरी गत हुई।

गलती नंबर एक- सिद्धारमैया को CM उम्मीदवार बनाना

कर्नाटक में सत्ता विरोधी लहर थी। सूबे की जनता सिद्धारमैया सरकार से नाखुश थी। इसका सबूत ये है कि सिद्धारमैया को दो-दो सीटों से चुनाव लड़ना पड़ा। उन्हें अपनी जीत का भरोसा नहीं था। हुआ भी ऐसा ही, सिद्धारमैया बादामी सीट से जीते, लेकिन चामुंडेश्वरी में हार गए। ऐसे में अगर कांग्रेस यहां से किसी और को सीएम उम्मीदवार बनाती तो आज नतीजे कुछ और होते।

गलती नंबर दो- मंदिर-मठों का ज्यादा दौरा

गुजरात के बाद राहुल ने कर्नाटक में भी अपने सॉफ्ट हिंदुत्व को आगे बढ़ाया। वो मंदिर-मंदिर गए। कई मठों का दौरा किया। ऐसा उन्होंने हिंदू वोटों को अपनी ओर करने के लिए किया। लेकिन राहुल को ऐसा कर्नाटक में भारी पड़ गया। नतीजों के मुताबिक सूबे के मुस्लिम बहुल 13 सीटों में से कांग्रेस को सिर्फ 7 सीटें मिलीं। जो पिछले चुनाव से एक कम है।

गलती नंबर तीन- उल्टा पड़ा लिंगायत का दांव

कांग्रेस की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने की केंद्र सरकार से सिफारिश की। प्रदेश में लिंगायतों की तादाद करीब 17 फीसदी है। जबकि सरकार के सर्वे में लिंगायतों को 9 फीसदी बताया गया। इसी बिना पर लिंगायत को अलग धर्म और अल्पसंख्यक बनाने की कोशिश की गई। ये बात समझते ही वोक्कालिगा समेत दूसरी जातियों को अपना हक मरता देख कांग्रेस से नाराज हो गए।

नंबर चार- गलती नंबर चार- जेडीएस-बीएसपी से गठबंधन नहीं करना

एक ओर जहां कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर विपक्षी पार्टियों को लामबंद करने की कोशिशों  जुटी है, तो फिर कर्नाटक चुनाव में गठबंधन से परहेज क्यों? क्या कांग्रेस ने ओवरकॉन्फिडेंस में किसी से गठबंधन नहीं किया। अगर ऐसा है तो ये पार्टी की बड़ी भूल साबित हुई। अगर कांग्रेस जेडीएस और बीएसपी के साथ मिलकर लड़ती तो शायद तस्वीर कुछ और होती।

और गलती नंबर पांच- पीएम पद पर दावेदारी !

राहुल गांधी ने एक चुनावी रैली में कहा कि मैं पीएम क्यों नहीं बन सकता। ये बात शायद उन्हें नहीं कहनी चाहिए थी। पूरी चुनाव प्रचार के दौरान राहुल की छवि साकारात्मक थी। लेकिन प्रधानमंत्री बनने की अपनी इच्छा जाहिर कर राहुल ने हड़बड़ी कर दी। कही न कहीं इसे जनता ने दंभ के दौर पर देखा।

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